जानलेवा ब्रेन एन्यूरिज़्म में मिनिमली इनवेसिव तकनीक बनी जीवनरक्षक

जानलेवा ब्रेन एन्यूरिज़्म में मिनिमली इनवेसिव तकनीक बनी जीवनरक्षक
एंडोवैस्कुलर तकनीक से ब्रेन एन्यूरिज़्म का इलाज अब पहले से ज्यादा सुरक्षित 

बरेली: एन्यूरिज़्म ब्लड वेसल्स की दीवारों में बनने वाला असामान्य उभार या फुलाव होता है, जो अधिकतर आर्टरीज़ में देखा जाता है। यह शरीर के विभिन्न हिस्सों में हो सकता है, जैसे दिमाग, एओर्टा या पेरिफेरल आर्टरीज़ में। कई बार एन्यूरिज़्म छोटे रहते हैं और कोई लक्षण नहीं देते, लेकिन कुछ मामलों में यह धीरे-धीरे बढ़ते हैं और फटने पर जानलेवा स्थिति पैदा कर सकते हैं। जब एन्यूरिज़्म दिमाग की  ब्लड वेसल्स में होता है, तो उसे सेरेब्रल एन्यूरिज़्म कहा जाता है। इसके फटने से सबएरैक्नॉइड हैमरेज हो सकता है, जो समय पर इलाज न होने पर गंभीर कॉम्प्लीकेशन्स और मृत्यु का कारण बन सकता है। 


परंपरागत रूप से ब्रेन एन्यूरिज़्म का इलाज ओपन सर्जरी से किया जाता था, जिसमें न्यूरोसर्जन को क्रैनियोटॉमी करके सीधे प्रभावित ब्लड वेसल्स तक पहुंचना पड़ता था और एन्यूरिज़्म के बेस पर क्लिप लगाई जाती थी। यह तरीका प्रभावी जरूर था, लेकिन काफी इनवेसिव होने के कारण इसमें रिकवरी का समय ज्यादा लगता था और खासकर बुजुर्ग मरीजों या अन्य बीमारियों से ग्रस्त मरीजों में जोखिम भी अधिक रहता था। 


मेदांता सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, नोएडा के न्यूरोइंटरवेंशन एवं स्ट्रोक विभाग के डायरेक्टर डॉ. गिरिश राजपाल ने बताया कि “आज के समय में एंडोवैस्कुलर थेरेपी ब्रेन एन्यूरिज़्म के इलाज के लिए एक मिनिमली इनवेसिव और अत्यंत प्रभावी विकल्प के रूप में उभरी है। इस तकनीक में ओपन सर्जरी की जरूरत नहीं होती, बल्कि ग्रोइन या कलाई में एक छोटे से पंक्चर के जरिए ब्लड वेसल्स के भीतर से ही एन्यूरिज़्म तक पहुंचा जाता है। डिजिटल सब्ट्रैक्शन एंजियोग्राफी जैसी एडवांस इमेजिंग तकनीकों की मदद से माइक्रोकैथेटर को बेहद सटीक तरीके से दिमाग की ब्लड वेसल्स के भीतर आगे बढ़ाया जाता है। एन्यूरिज़्म तक पहुंचने के बाद उसका इलाज विभिन्न आधुनिक तरीकों से किया जाता है। कॉइलिंग तकनीक में प्लैटिनम की बेहद पतली कॉइल्स को एन्यूरिज़्म के अंदर डाला जाता है, जिससे वहां ब्लड क्लॉट बन जाता है और एन्यूरिज़्म में ब्लड फ्लो रुक जाता है। वहीं फ्लो डाइवर्टर जैसे स्टेंट-लाइक डिवाइस एन्यूरिज़्म की गर्दन पर लगाए जाते हैं, जिससे खून का बहाव उभार से हटकर सामान्य ब्लड वेसल्स की ओर मुड़ जाता है और समय के साथ एन्यूरिज़्म खुद ही बंद होने लगता है।“    


डॉ. गिरिश ने आगे बताया कि “एंडोवैस्कुलर थेरेपी के कई महत्वपूर्ण फायदे हैं। यह मिनिमली इनवेसिव होने के कारण मरीज को कम दर्द, कम ब्लड लॉस और कम समय में अस्पताल से छुट्टी मिलने का लाभ देती है। रिकवरी तेजी से होती है और रोजमर्रा की जिंदगी में वापसी भी जल्दी संभव होती है। जो मरीज ओपन सर्जरी के लिए हाई रिस्क माने जाते हैं, उनके लिए यह तकनीक कहीं अधिक सुरक्षित विकल्प साबित होती है। आधुनिक इमेजिंग और नेविगेशन सिस्टम की मदद से डिवाइस की सटीक प्लेसमेंट संभव होती है, जिससे इलाज की सफलता दर भी बेहतर होती है और कॉम्प्लिकेशन का खतरा कम होता है।“ 


हालांकि, किसी भी मेडिकल प्रोसीजर की तरह एंडोवैस्कुलर इलाज में भी कुछ जोखिम हो सकते हैं, जैसे पंक्चर साइट पर ब्लीडिंग, ब्लड वेसल्स को नुकसान या क्लॉट बनने की संभावना। कुछ मामलों में एन्यूरिज़्म दोबारा उभर सकता है, जिसके लिए फॉलो-अप इमेजिंग और कभी-कभी दोबारा इलाज की जरूरत पड़ती है। लेकिन अनुभवी विशेषज्ञों और अत्याधुनिक सुविधाओं के साथ इन जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। 


कुल मिलाकर, एंडोवैस्कुलर थेरेपी ने ब्रेन एन्यूरिज़्म के इलाज की दिशा ही बदल दी है। यह मरीजों को एक ऐसा लाइफ-सेविंग विकल्प देती है, जिसमें प्रिसिशन, सेफ्टी और तेज रिकवरी का बेहतरीन संतुलन होता है। एन्यूरिज़्म के प्रति जागरूकता, समय पर जांच और सही समय पर इलाज मरीज की जान बचाने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। लगातार विकसित हो रही डिवाइस टेक्नोलॉजी और तकनीकों के साथ भविष्य में एन्यूरिज़्म का इलाज पहले की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनता जा रहा है।

P.K. SHARMA

Blogging in difference subjects since 2012 and related many media companies, having experiences in this field about 12 years.

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